ब्रह्मलीन सदगुरु श्री श्री 108 राजमाता जी महाराज

ब्रह्मलीन सदगुरु श्री श्री 108 राजमाता जी महाराज एक गृहस्थ जीवन में उत्तम कर्मयोगी साध्वी थी। गृहस्थ जीवन में अपने कर्तव्यकर्म करते हुए ध्यान उनका सदा अष्टभुजी मां के चरणों में लगा रहता था। पति बच्चों की सेवा को छोड़कर नहीं बल्कि अपने पूरे कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए पूजा पाठ कीर्तन सत्संग भजन में अनवरत चल रहा था। धीरे धीरे उनके द्वारा की जा रही भक्ति की सुगंध भक्तों से छिपी न रही ओर उनके द्वार पर भक्तों की पंक्ति लगने लगी ओर स्वार्थी संसार को तृष्णा से बढ़कर क्या जरूरत होती हैं? यानी उनकी शरण में पहुंचने पर रोगी को निरोग,निर्धन को धन,बेरोजगार को रोज ओर निसंतान दंपतियों की झोली भरने लगी,जिससे भक्तों की संख्या बढ़ने लगी।

भक्तों की बढ़ती संख्या और सदगुरु श्री राजमाता जी महाराज पर महंगाई की कृपा निरंतर दसों दिशाओं में फैलने लगीं। इस समय तक श्री राजमाता जी महाराज कश्मीरी गेट दिल्ली में रहते थे जहां से कीर्तन करने हर वीरवार को शाहदरा कबूल नगर उनकी शिष्या श्रीमती यमुना जी के निवास स्थान पर आते थे। भगवान के भक्तों के मन में यह अटूट विश्वास होता हैं कि हमको व्यवधान पैदा नहीं करना क्योंकि हमें विश्वास है कि जो हो रहा हैं वह अच्छा हो रहा है। इस जगह पर हम यह इसलिए कह रहे हैं क्योंकि श्रीमती यमुना जी के दामाद ने उस कीर्तन के प्रति कुछ अरुचि दर्शाई तो नजदीक ही सदगुरु महराज द्वारा एक छोटा सा स्थान मंदिर के रूप में निर्माण किया गया जोकि सत्तर के दशक में श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर के नाम से धीरे धीरे प्रसिद्धि प्राप्त करता चला गया।

चंदन की सुगंध को कौन रोक पाया है यही बात सिद्ध हुई इस संस्थान से ओर गुरुदेव श्री राजमाता जी महाराज से यानी जब लोगो की मनोकामनाएं पूर्ण होती दिखाई दी तो कबूल नगर शाहदरा स्थित एक परिवार जिनके रिश्तेदार कलकत्ता रहते थे वह एक बार गुरुदेव के चरणों में आए तो ऐसा प्रभावित हुए उन्होंने सदगुरू श्री राजमाता जी महाराज से दीक्षा ग्रहण की ओर गुरु दक्षिणा के रूप में एक भूखंड जोकि आज श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर गोरख पार्क शाहदरा दिल्ली 32 में स्थित है उन्होंने भूदान के रूप में दे दिया।

गोरख पार्क शाहदरा स्थित श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर के गर्भगृह में सदगुरु श्री राजमाता जी महाराज की इच्छा से गुफा का निर्माण किया गया जिसमें सदगुरु पूर्ण नवरात्र मौन तपस्या करते रहे।ओर उन्हें भक्तिमार्ग पर अनेक बार आद्य भौतिक,आध्यात्मिक, दैविक कष्ट विघ्न रुकावटें आई लेकिन सदगुरु श्री राजमाता जी महाराज दृढ़ संकल्प लगन से अपने इष्ट अष्टभुजी मां की भक्ति में परिपक्वता से आगे बढ़ती चली जा रही थी।

इनमें से एक घटना घटी कश्मीरी गेट लगभग सन् 1975 की बात होगी। नवरात्र अनुष्ठान में जब अपने अखंड आसन पर विराजमान हुई तो पांचवे नवरात्र पर गुरुदेव की युवा बेटी पिंकी को खून की उल्टी हुई।पिंकी बेटी ने बताया कि मुझे रात में स्वप्न दिखाई दिया जिसमें मातारानी मुझे कह रही हैं कि "मैं तेरी मां की परिक्षा ले रही हूं तू मर जाएगी फिर देखेंगे राजमाता जी अपनी साधना रोकती हैं या आगे बढ़ती है।" उस पिंकी बेटी ने कहा अगर मै मर जाऊं तो मुझे जलाना मत बल्कि मुझे यमुना में बहा देना ताकि मेरी मृत देह कम से कम मछलियों का पेट भरने के काम तो आ जाए। ऐसा ही हुई शायद छठे नवरात्र की बात होगी कि पिंकी बेटी ने इरविन हॉस्पिटल में प्राण छोड़ दिए,उसकी इच्छानुसार उसके पार्थिव शरीर को यमुना में विसर्जित कर दिया गया। अष्टमी जागरण के लिए प्रबंधक लोग असमंजस में थे कि एक दिन पहले बेटी का देहांत हुआ है तो अब जागरण नहीं होगा? लेकिन जब गुरुदेव श्री राजमाता जी महाराज को मालूम हुआ उन्होंने तत्काल आदेश दिया कि "बेटी मां की थी मां ले गई,जागरण होगा। लोग रिश्तेदार मुंह में उंगलियां डालकर बातें बना रहे थे कुछ रो रहे थे लेकिन गुरुदेव सहजता से भक्ति मार्ग प्रशस्त कर रहे थे।

दूसरी घटना घटी 21 अगस्त 1982 को जब सदगुरु श्री राजमाता जी महाराज के पतिदेव लाला दरियाई लाल जी का दोपहर में देहांत हो गया लेकिन भक्ति मार्ग जागरण पंथ में तारारानी की कथा गाई जाती हैं। जागरण पंथ में एक रस्म होती हैं जिसे ढल प्रथा यानी एक निमंत्रण होता हैं कि जिस व्यक्ति ने जागरण कराने वाले परिवार से ढल लिए होते है उसे किसी भी विपरीत परिस्थितियों में जागरण में अवश्य पहुंचना पड़ेगा।यही तारारानी की कथा में है और यही श्री राजमाता जी महाराज के साथ हुआ यानी 21अगस्त को पति का देहांत हुआ लेकिन गुरुदेव की प्रिय शिष्य प्यारेलाल के द्वारा उसी रात जागरण के ढल पहले से माता जी ने लिए हुए थे। सायंकाल पतिदेव का अंतिम संस्कार किया ओर रात में जाकर जागरण में ज्योत प्रचंड की तो चारों ओर भक्ति की दृढ़ता, लगन, दृढ़ संकल्प के चर्चे होने लगे परंतु माताजी का ध्यान अच्छाई बुराई से ऊंचे लक्ष्य मात्र अष्टभुजी मां के चरणों में रत था। (इस प्रसंग पर विश्व प्रसिद्ध गायक नरेंद्र चंचल जी ने एक किस्सा रूपी भेंट भी गाई है जिसका लेखन चंचल जी के गुरु चमन लाल जोश जी ने किया था)।

श्री राजमाता जी महाराज की ख्याति भक्ति की चर्चा धीरे दिल्ली से बाहर जम्मू कश्मीर हरिद्वार उत्तराखंड उत्तर प्रदेश पंजाब में फैलने लगीं। ओर इसी के साथ एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक धार्मिक तीर्थ का निर्माण हुआ जिसका नाम *"श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर"* प्रसिद्ध हुआ। माताजी के जीवन काल में ही कृष्णा नगर जगतपुरी में शिष्यों के घर के पास एक पूजा भूखंड पर विवाद चल रहा था उस विवाद को समाप्त करने के लिए यह निर्णय लिया गया कि यह भूखंड हम श्री राजमाता जी महाराज को दान में दे देते हैं।वह अपनी इच्छानुसार इस भूखंड पर मंदिर का निर्माण करेंगे और फिर वहां पर भी एक स्थान श्री राजमाता जी मंदिर का निर्माण हुआ।इस दौरान माताजी के शिष्यों द्वारा जम्मू में भी एक स्थान प्राप्त हुआ ग्राम सिद्धडा जम्मू बाय पास पर आश्रम का निर्माण हुआ।अभी इस जम्मू आश्रम का निर्माण कार्य चल ही रहा था कि हरिद्वार सुखी नदी भूपतवाला कैलाश गली में आश्रम 26 जून 1999 को शिलान्यास किया गया।

इसी दौरान माताजी के सबसे छोटे बेटे श्री राजेश वोहरा जी गुरुगद्दी सेवा में समय समय पर माताजी के साथ सहयोग करते रहने लगे।हरिद्वार आश्रम का निर्माण कार्य हो या जम्मू आश्रम का निर्माण कार्य हो।भजन प्रस्तुति में राजेश वोहरा जी ऐसा समां बांध दिया करते थे कि भक्तलोग मस्ती में झूमने लगते थे और इस नन्हें से पौधे की सुगंध बिखरनी शुरू हो गई थी।छोटा सा दीपक टिमटिमाने लगा था। इस लोक को मृत्युलोक कहा जाता है यानी जो आया है उसने जाना है। यहां स्थाई रूप से कोई रुक नहीं सकता।क्या संत महात्मा,क्या राजा,क्या निर्धन ओर धनवान अपना किरदार निभाकर सबको वापिस अज्ञात लोक में लौटना पड़ेगा और यही सत्य से अवगत होना पड़ा 21 नवंबर 1999 का वह दिन जब सदगुरु श्री राजमाता जी महाराज का स्वास्थ्य गिरता चला गया और उन्होंने महाप्रयाण की यात्रा पर प्रस्थान कर लिया।